7 Short Emotional Story in Hindi: शॉर्ट इमोशनल स्टोरी इन हिंदी

दोस्तों, इसमे कोई दो राय नहीं है कि किसी भी समाज से ज्यादा हमारे भारतीय समाज में परिवार और रिश्तों का विशेष महत्व है और आज के इस ब्लॉग पोस्ट “Short Emotional Story in Hindi” में हम आपको 7 ऐसी शॉर्ट इमोशनल स्टोरी सुनाने जा रहे हैं जो माँ-बेटे, पिता-बेटी, और पति-पत्नी के रिश्तों की गहराई को दर्शाती है जो आपकी दिल को छू जायेगी। 

साथ ही इस पोस्ट में हमने गरीबी की मार, भगवान में आस्था, और सास-बहू के बीच के सबसे दुःखद रिश्ते की समस्याओं को भी उजागर किया है जो हमारे भारतीय समाज की एक कटु सत्य है। 

आशा करते हैं कि हमारी आज की यह Short Emotional Story in Hindi आपके दिल को छूने के साथ-साथ आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि कैसे रिश्ते और परिस्थितियाँ हमारी जिंदगी को प्रभावित करती हैं। तो तैयार हो जाइए एक भावनात्मक यात्रा पर जाने के लिए!

Short Emotional Story in Hindi: शॉर्ट इमोशनल स्टोरी इन हिंदी

तो ये है वो 7 शॉर्ट इमोशनल कहानियां (short emotional stories in hindi) हैं जो आपके दिल को छू जाएंगी।

1. एक माँ की दिल को छूने वाली छोटी कहानी (Short Emotional Story in Hindi)

एक माँ की दिल को छूने वाली छोटी कहानी (Short Emotional Story in Hindi)

एक विधवा मां थी। उसके दो बेटे थे। एक बेटा घर के नीचे वाले माले पर रहता था और दूसरा बेटा ऊपर वाले माले पर रहता था। वह विधवा मां 15 दिन एक बेटे की यहाँ खाना खाती थी और 15 दिन दूसरे बेटे के यहाँ खाती थी। पर उस विधवा मां का दुर्भाग्य था कि साल में जो जो महीने 31 दिन के होते थे, उस एक दिन उस विधवा मां को उपवास रखना पड़ता था। 

वह बूढ़ी मां अक्सर पूजा पाठ किया करती थी। ऐसे में जब भी वह मां उपवास करती कभी इस बात को दिल से नहीं लगाती थी। लेकिन एक दिन उसके दिल को बहुत ठेस पहुंची जब उसकी बहू ने कहा कि मां जी आप अपना खाना बना लेना आज हम लोग बाहर एक पार्टी में जा रहे हैं। 

उस बूढ़ी मां ने कहा – बहू मैं खाना कैसे बनाउंगी? मुझे तो गैस चूल्हा जलाना ही नहीं आता। तभी पीछे से उसके बेटे ने कहा – मां आज पास वाले मंदिर में भंडारा है, तुम वही चले जाना और खा लेना। तुम्हें खाना बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। वह विधवा मां हां में सर हिलाती है और चुपचाप चप्पल पहनकर उस मंदिर की तरफ चल पड़ती है। 

यह सारी बातें 10 साल का छोटा रोहित सुन रहा था। जब वे तीनों अपनी गाड़ी में बैठ कर पार्टी के लिए रास्ते में जा रहे थे, तभी अचानक रोहित अपने पापा से बोलता है – पापा बड़े होकर जब मैं एक बडा आदमी बन जाऊंगा तब मैं भी अपना घर किसी मंदिर के पास ही बनाऊंगा। 

मां ने उत्सुकतावश पूछा क्यों बेटा? फिर रोहित ने जो जवाब दिया, यह सुनकर उस बहू और बेटे का सर शर्म से झुक गया, मानो उसके पैरों की जमीन खिसक गई हो। 

रोहित बोला – मां जब मेरी शादी हो जाएगी, जब हमें भी ऐसे ही किसी पार्टी में जाना होगा तब आप दोनों भी मंदिर में भंडारा खाने जाओगी ना और मैं नहीं चाहता कि आप को दूर के किसी मंदिर में जाना पड़े। 

दोस्तों, जो मां अपनी औलाद को नौ महीने तक अपने गर्भ में ढोती है, असहनीय कष्ट और पीड़ा सहकर उसे जन्म देती है, अपने उस कलेजे के टुकड़े का लालन पालन करने में न जाने कितने रातों को जाग जागकर बिताती है, कितने दुख और दर्द को झेलकर वह अपने लाडले को पाल पोसकर बड़ा करती है। पर जब वह बेटा जवान हो जाता है, तब वही मां उसे बोझ क्यों लगने लगती है? 

जो बाप अपने औलाद की परवरिश के लिए दिन रात कड़ी मेहनत करता है, जो अपने संतान के लिए अच्छे कपड़े, अच्छा खाना, अच्छे स्कूल, अच्छी शिक्षा के लिए अपनी जी जान लगा देता, वह अपनी कमाई का एक एक पाई खुशी खुशी खर्च कर देता है ताकि उसकी संतान एक दिन बड़े होकर कुछ बन जाए, अपने पैरों पर खड़े हो जाए। पर जब वे बूढ़े हो जाते हैं तब वही बेटा अपने बूढ़े मां बाप को दो जोड़ी कपड़े और दो वक्त की रोटी देने से क्यों कतराने लगता है?

दोस्तों, ईश्वर हर जगह नहीं पहुंच सकते इसलिए उसने माएं बनाई हैं। मां के कदमो में स्वर्ग होता है। उसकी छाया सुख देती है। उसके आशीर्वादों का कवच हमें सुरक्षा प्रदान करता। 

उसको नहीं देखा हमने कभी, पर उसकी जरूरत ही क्या होगी। हे मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी।

कहते हैं – 

बहुत रोते हैं मगर दामन हमारा नम नहीं होता। इन आंखों के बरसने का कोई मौसम नहीं होता। 

मैं अपने दुश्मनों के बीच भी महफूज रहता हूं। मेरी मां की दुआओं का खजाना कभी कम नहीं होता।

आशा करता हूँ कि यह कहानी आपको जरूर पसंद आयी होगी।


2. महान खिलाड़ी की रूलाने वाली कहानी (Emotional Story in Hindi with Moral)

बाप-बेटी की रूलाने वाली कहानी (Emotional Story in Hindi with Moral)

एक महान पिता का एक महान पुत्र जिसने पैदा होने के साथ ही अपने पिता को बास्केटबॉल (Basketball) खेलते हुए देखा, उसने उनकी प्रतिष्ठा देखी, मान सम्मान देखा। जी हाँ, यहाँ हम बात कर रहे हैं कोबी ब्रायंट (Kobe Bryant) की जो बड़ा हुआ इस अपेक्षा के साथ कि उसे अपने पिता की ही तरह एक महान बास्केटबॉल प्लेयर बनना है। 

बचपन से ही जब एक महान लक्ष्य सामने हो तो उसके लिए परिश्रम भी कठिन करना पड़ता है। किसी भी सफलता के पीछे परिश्रम और सही दिशा निर्देश का बहुत बड़ा योगदान होता है। कोबी ब्रायंट (Kobe Bryant) की सफलता के पीछे भी यही वजह थी। वे बचपन से ही घंटों बास्केटबॉल का अभ्यास करता, क्योंकि उसे अपनी एक अलग पहचान जो बनानी थी। 

उसे अपना लक्ष्य तो पता था पर चुनौती उसके सामने थी। अपने पिता की छाया से अलग हटकर अपने लिए एक बहुत ऊंचा मुकाम हासिल करने का। उसने किया भी वही। उसकी मेहनत रंग लाई और उसे एक कम उम्र में ही सर्वोत्तम हाई स्कूल बास्केटबॉल प्लेयर की पहचान मिली। 

लोग उसे उसके नाम से पहचानने लगे। जरा सोचिए, उस पिता का गर्व, जिसका पुत्र उससे ज्यादा सफल हो जाए। शायद इससे ज्यादा खुशी की बात कोई और न होगी। 

उनके लिए कहते हैं ना कि जिंदगी आसान नहीं होती। कोबी ब्रायंट (Kobe Bryant) की जिंदगी आसान नहीं थी। उसने बहुत संघर्ष किया। चाहे वे उसके विवाह को लेकर हो या उसके प्रोफेशनल कैरियर को लेकर। हर चुनौती, हर संघर्ष में वे विजयी हुआ, मगर हार गए अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा में। 

वे अपना और अपनी 13 साल की बेटी का जीवन गंवा बैठा जनवरी 26, 2020 के एक हेलीकॉप्टर क्रैश में। जीवन भर का संघर्ष, कड़ी मेहनत और ऐसी ऊंचाई पर पहुंचना सब एक झटके में खत्म हो गया। 

वे तो चले गये, पर छोड़ गए अपने पीछे अनगिनत सपने, अपने माता पिता, अपनी पत्नी और बच्चों को। उसकी अपनी पत्नी के साथ विश्व भ्रमण की ख्वाहिशें, ख्वाहिशें ही रह गई। इतनी मेहनत की एक मुकाम पर पहुंचने के लिए। पर एक दिन एक हेलीकॉप्टर क्रैश हुआ और एक झटके में कहानी खतम। 

सारे अधूरे सपने और सारा नाम सब यहीं छूट गया। बस आत्मा रह गई जो हर ख्वाहिश, हर सपने और हर मुकाम से परे है। 

कोबी ब्रायंट (Kobe Bryant) आज भी बास्केटबॉल प्लेयर जगत में एक नाम है। वे नाम जो मरने के बाद भी इज्जत से लिया जाता है। 

ये जिंदगी अनिश्चित है। कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता। जिंदगी भर जो मुकाम हासिल करने के लिए मेहनत करते हैं, वे मुकाम और सगे संबंधी सब पीछे छूट जाते हैं। बस जो याद रह जाता है वह आपका दूसरों के साथ व्यवहार। आपने दूसरों के साथ क्या किया, कैसे किया, इसमें आपको आपकी मृत्यु के बाद फर्क नहीं पड़ेगा, पर उन सब को जरूर प्रभावित करेगा जो आपके करीबी है, जिन्हें आप अत्यंत प्यार करते हैं। 

अगर आप वाकई में अपने प्रियजनों से प्यार करते हैं, उनकी कद्र करते हैं तो काम वही करिए जिसके असर से आपके प्रियजन दुखी न हो। 

अगर कोबी ब्रायंट (Kobe Bryant) की मृत्यु के बाद एनबीए (NBA) के अगले मैच में उसकी आत्मा की शांति के लिए कुछ देर का मौन रखा गया या बड़े बड़े लोगों ने उसकी मृत्यु पर दुख व्यक्त किया या फिर उसकी मृत्यु के पांच महीने बाद भी उसकी पत्नी और माता पिता को इज्जत से देखा जा रहा है, तो शायद यह कोबी ब्रायंट (Kobe Bryant) की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

यू तो कोबी ब्रायंट (Kobe Bryant) की जिंदगी से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। लेकिन मुख्य तीन बातें आपको बताऊंगा। 

  • पहली बात, मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। 
  • दूसरी बात, जिंदगी में आप कितनी भी ऊंचाइयों पर पहुंच जाएं, दूसरों से व्यवहार अच्छा ही रखिए। और 
  • तीसरी बात, कुछ करने के लिए कल का इंतजार मत करिए।

3. गरीब की दिवाली, इमोशनल स्टोरी इन हिंदी (Heart-touching Emotional Story in Hindi)

गरीब की दिवाली, इमोशनल स्टोरी इन हिंदी (Heart-touching Emotional Story in Hindi)

एक पोस्टमैन ने एक घर के दरवाजे पर दस्तक देते हुए कहा, चिट्ठी ले लीजिए। अंदर से एक लड़की की आवाज आई। आ रही हूं। लेकिन तीन चार मिनट तक कोई नहीं आया तो पोस्टमैन ने फिर कहा, अरे भाई! मकान में कोई है या नहीं, अपनी चिट्ठी ले लो। 

लड़की की फिर आवाज आई। पोस्टमैन साहब, दरवाजे की नीचे से चिट्ठी अंदर डाल दीजिए, मैं आ रही हूं। पोस्टमैन ने कहा नहीं, मैं खड़ा हूं। रजिस्टर्ड चिट्ठी है। पावती पर तुम्हें साइन करने पड़ेंगे। 

करीबन छह, सात मिनट के बाद दरवाजा खुला। पोस्टमैन इस देरी के लिए थोड़ा जला हुआ था और उस पर चिल्लाने वाला ही था। लेकिन दरवाजा खुलते ही वह चौंक गया कि सामने एक अपाहिज कन्या, जिसके पांव नहीं थे, सामने खड़ी थी। पोस्टमैन चुपचाप पत्र देकर और उसके साइन लेकर चला गया। 

हफ्ते दो हफ्ते में जब कभी उस लड़की के लिए डाक आती, एक आवाज देता और जब तक वह कन्या न आती, तब तक वह खड़ा रहता। 

एक दिन उसने पोस्टमैन को नंगे पांव देखा। दीपावली नजदीक आ रही थी। उसने सोचा पोस्टमैन को क्या तोहफा दूं?

एक दिन जब पोस्टमैन डाक देकर चला गया, तब उस लड़की ने मिट्टी में पोस्टमैन के पांव के निशान बने देखे। उन पर कागज रखकर उन पांवों का चित्र उतार लिया। अगले दिन उसने अपने यहां काम करने वाली बाई से उस नाप के जूते मंगवा लिए। 

दीपावली आई और उसके अगले दिन पोस्टमैन ने गली के सब लोगों से तो इनाम मांगा और सोचा कि अब इस बिटिया से क्या इनाम लेना, पर गली में आया हूं तो उससे मिल ही लूं। उसने दरवाजा खटखटाया। अंदर से आवाज आई कौन? उत्तर आया? पोस्टमैन। 

लड़की हाथ में एक गिफ्ट पैकेट लेकर आई और कहा, अंकल, मेरी तरफ से दीपावली पर आपको यह भेंट है। पोस्टमैन ने कहा, तुम तो मेरे लिए बेटी के समान हो। तुमसे मैं गिफ्ट कैसे लूं? 

कन्या ने आग्रह किया कि मेरे इस गिफ्ट के लिए मना नहीं करें। बालिका ने कहा अंकल इस पैकेट को घर ले जाकर खोलना। घर जाकर जब उसने पैकेट खोला तो विस्मित रह गया क्योंकि उसमें एक जोड़ी जूते थे। उसकी आंखें भर आई। 

अगले दिन वह पोस्टमैन ऑफिस पहुंचा तो उसने अपने पोस्टमास्टर से फरियाद कीया कि उसका तबादला फौरन कर दिया जाए। पोस्टमास्टर ने कारण पूछा तो पोस्टमैन ने वह जूते टेबल पर रखते हुए सारी कहानी सुनाई और भीगी आंखों से रुँधे हुए कंठ से कहा, आज के बाद मैं उस गली में नहीं जा सकूंगा। 

उस अपाहिज बच्ची ने तो मेरे नंगे पांव को जूते दे दिए, पर मैं उसे पांव कैसे दे पाऊंगा?

दोस्तो, संवेदनशीलता यानी दूसरे के दुख दर्द को समझना, अनुभव करना और उसके दुख दर्द में भागीदारी करना, उसमें शारीरिक होना, यह ऐसा मानवीय गुण है जिसके बिना इंसान अधूरा। 

ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें संवेदनशीलता रूपी आभूषण प्रदान करे ताकि हम दूसरों के दुख दर्द को कम करने में योगदान कर सकें। संकट की घड़ी में कोई यह नहीं समझे की वह अकेला है अपितु उन्हें महसूस हो कि सारी मानवता उसके साथ है। 

दोस्तों, अगर इस short emotional story in hindi ने आपके दिल को छुआ हो तो इसे शेयर जरूर करें और हमें आपके बहुमूल्य विचार कमेंट करके जरूर बताएं। धन्यवाद।


4. गरीब फल बेचने वाले की कहानी (Emotional Kahni in Hindi)

गरीब फल बेचने वाले की कहानी (Emotional Kahni in Hindi)

बाजार में एक फल की रेहड़ी की छत से एक छोटा सा बोर्ड लटक रहा था। उस पर मोटे अक्षरों से लिखा हुआ था – 

घर में कोई नहीं है। मेरी बूढ़ी मां बीमार है। मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा, और टॉयलेट कराने के लिए घर जाना पड़ता है। अगर आपको जल्दी है तो आप अपनी मर्जी से फल तोल लें। कीमत साथ में लिखी है। पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें। धन्यवाद। 

अगर आपके पास पैसे नहीं भी हैं तो मेरी तरफ से ले लेना इजाजत है। एक ग्राहक ने इधर उधर देखा, पास पड़े तराजू में से दो किलो सेब तोली, दर्जन भर केले लिए बैग में डाले, फलो की कीमत लिस्ट में से देखी, पैसे निकालकर गत्ते को उठाया, वहां 150 और 10 10 के नोट पड़े थे, उसमें पैसे रखकर उसे ढक दिया, अपना फलो का बैग उठाया और अपने फ्लैट पर आ गया। 

रात को खाना खाने के बाद वह आदमी उधर से निकला तो देखा एक कमजोर सा आदमी दाढ़ी आधी काली आदि सफेद, मैले से कुर्ते पजामे में रेडी को धक्का लगाकर बस जाने ही वाला था, वह उस आदमी को देखकर मुस्कुराया और बोला, साहब, फल तो खत्म हो गए। 

उसका नाम पूछा तो बोला सीता राम। फिर वह दोनो सामने वाले ढाबे पर बैठ गए। चाय आई तो वह कहने लगा पिछले तीन साल से मेरी माता बिस्तर पर है। कुछ पागल सी भी हो गई है और अब तो धीरे धीरे शरीर बहुत कमजोर होने लगा है। उनका मेरी कोई संतान नहीं है। बीवी मर गई, सिर्फ मैं हूं और मेरी मां, मां की देखभाल करने वाला कोई नहीं है इसलिए मुझे हर वक्त मां का खयाल रखना पड़ता है। 

एक दिन मैंने मां के पांव दबाते हुए बड़ी नरमी से कहा, मां, तेरी सेवा करने को तो बड़ा जी चाहता है, पर जेब खाली है और तू मुझे कमरे से बाहर निकलने नहीं देती। कहती है तू जाता है तो जी घबराने लगता है। तू ही बता मैं क्या करूं? न ही मेरे पास कोई जमा पूंजी है। 

यह सुनकर मां ने हांफते कांपते उठने की कोशिश की। मैंने तकिये की टेक लगवाई। उन्होंने झुर्रियों वाला चेहरा उठाए, अपने कमजोर हाथों को ऊपर उठाया, मन ही मन राम जी की स्तुति करी और फिर बोली, तू रेडी वहीं छोड़ आया कर। हमारी किस्मत का हमें जो कुछ भी है, इसी कमरे में बैठकर मिलेगा। 

मैंने कहा मां क्या बात करती हो? वहां छोड़ आऊंगा तो कोई चोर उचक्का सब कुछ ले जाएगा। आजकल कौन लिहाज करता है और बिना मालिक के कौन फल खरीदने आएगा? 

कहने लगी तू राम का नाम लेने के बाद उस रेडी को फलों से भरकर छोड़ कर आजा बस। ज्यादा बकबक नहीं कर। शाम को खाली रेडी ले आया कर। अगर तेरा रुपया गया तो मुझे बोलियो।

भाईसाहब, ढाई साल हो गए हैं, सुबह रेडी लगा आता हूं और शाम को वापिस ले जाता हूं। लोग पैसे रख जाते हैं, फल ले जाते हैं। एक ढेला भी ऊपर नीचे कभी नहीं होता, बल्कि कुछ तो ज्यादा भी रख जाते हैं। 

कभी कोई मां के लिए फूल रख जाता है, कोई खजूर रख जाता है तो कभी कोई और चीज। रोजाना कुछ ना कुछ मेरे हक के साथ मौजूद होता है साहब। परसों एक बच्ची पुलाव बना कर रख गई। साथ में एक पर्ची भी थी अम्मा के लिए। 

एक डॉक्टर अपना कार्ड छोड़कर गई। पीछे लिखा था, मां की तबीयत नाजुक हो तो मुझे कॉल कर लेना। मैं आ जाऊंगा। 

न मां मुझे हिलने देती है न मेरे राम कुछ कमी रहने देते हैं। 

मां कहती है, तेरे फल मेरे राम अपने फरिश्तों से बिकवा देते हैं। 

आखिर में इतना ही कहूंगा कि अपने मां बाप की सेवा करो और देखो दुनिया की कामयाबियां कैसे आपके कदम चूमती है। 

दोस्तों, अगर आपको यह कहानी अच्छी लगी हो तो सभी दोस्तों के साथ और अपने रिश्तेदारों के साथ इस पोस्ट को शेयर जरूर करें। धन्यवाद।


5. पति पत्नी की अनसुनी कहानी (Sad Emotional Story in Hindi) 

पति पत्नी की अनसुनी कहानी (Sad Emotional Story in Hindi) 

कॉलेज में हैप्पी मैरिड लाइफ (happy married life) पर एक कार्यक्रम हो रहा था, जिसमें कुछ शादीशुदा जोड़ा हिस्सा ले रहे थे। जिस समय प्रोफेसर मंच पर आए उन्होंने नोट किया कि सभी पति पत्नी पर जोक कर हंस रहे थे। यह देखकर प्रोफेसर ने कहा कि चलो पहले गेम खेलते हैं, उसके बाद अपने विषय पर बात करेंगे। 

सभी बहुत खुश हो गए और कहा कौन सी गेम? 

प्रोफेसर प्रोफेसर ने एक मैरिड लड़की को खड़ा किया और कहा कि तुम ब्लैकबोर्ड पर ऐसे 25, 30 लोगों के नाम लिखो जो तुम्हें सबसे अधिक प्यारे हो। 

लड़की ने पहले तो अपने परिवार के लोगों के नाम लिखे, फिर अपने सगे संबंधी, फिर दोस्त, पड़ोसियों और सहकर्मियों के नाम लिख दिए। 

प्रोफेसर ने कहा, उसमें से कोई भी जो आपको कम पसंद वाले पांच नाम है, उनको मिटा दो। लड़की ने अपने सहकर्मियों के नाम मिटा दिए। 

प्रोफेसर ने कहा, और पांच नाम मिटा दो। लड़की ने थोड़ा सोचकर अपने पड़ोसियों के नाम मिटा दिए। 

प्रोफेसर ने कहा, और 10 नाम मिटा दो। लड़की ने अपने सगे संबंधी और दोस्तों के नाम मिटा दिए और अब बोर्ड पर सिर्फ चार नाम बचे थे, जो उसकी मम्मी, पापा, पति और उसके बच्चे का नाम था। 

अब प्रोफेसर ने कहा, इनमें से दो नाम और मिटा दो। लड़की थोड़ी असमंजस में पड़ गई। बहुत सोचने के बाद बहुत दुखी होते हुए उसने अपने मम्मी पापा का नाम मिटा दिया। 

सभी लोग घबराए हुए और शांत थे क्योंकि वह जानते थे कि यह गेम सिर्फ लड़की नहीं खेल रही थी। उनके दिमाग में भी यही सब चल रहा था। अब सिर्फ दो ही नाम बचे थे पति और बेटे का। 

प्रोफेसर ने कहा, और एक नाम मिटा दो। 

लड़की अब सहमी सी रह गई। बहुत सोचने के बाद रोते हुए अपने बेटे का नाम काट दिया। प्रोफेसर ने उस लड़की से कहा, तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ। 

प्रोफेसर ने सबकी तरफ गौर से देखा और पूछा, क्या कोई बता सकता है कि ऐसा क्या हुआ कि सिर्फ पति का ही नाम बोर्ड पर रह गया। कोई जवाब नहीं दे पाया। सभी मुंह लटकाकर बैठे थे। 

प्रोफेसर ने फिर उस लड़की को खड़ा किया और कहा, ऐसा क्यों? जिसने तुम्हें जन्म दिया और पाल पोसकर इतना बड़ा किया, उसका नाम तुमने मिटा दिया। और तो और, तुमने अपनी कोख से जिस बच्चे को जन्म दिया, उसका भी नाम तुमने मिटा दिया। 

लड़की ने जवाब दिया, कि मम्मी पापा बूढ़े हो चुके हैं और कुछ साल के बाद वह मुझे और इस दुनिया को शायद छोड़कर चले जाएंगे। मेरा बेटा जब बड़ा हो जाएगा तो जरूरी नहीं कि वह शादी के बाद मेरे साथ ही रहे। लेकिन मेरे पति जब तक मेरी जान में जान है, तब तक मेरा आधा शरीर बनकर मेरा साथ निभाएंगे। इसलिए मेरे लिए सबसे अजीज ही मेरे पति है। 

प्रोफेसर और बाकी स्टूडेंट ने तालियों की गूंज के साथ लड़की को सलामी दी। 

प्रोफेसर ने कहा, तुमने बिल्कुल सही कहा कि तुम और सभी के बिना रह सकती हो, पर अपने आधे अंग अर्थात अपने पति के बिना नहीं रह सकती। 

मजाक मस्ती तक तो ठीक है पर इंसान का अपना जीवन साथी ही उसका सबसे ज्यादा अजीज होता है। जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी। 

दोस्तों, अगर इस छोटी सी एमोसनल कहानी ने आपके दिल को छुआ हो तो इस पोस्ट को अपने सभी दोस्तों के साथ और अपने रिश्तेदारों के साथ शेयर जरूर करें।


6. माँ-बेटे के रिश्ते की दिल छूने वाली कहानी (Heart-touching Short Emotional Story in Hindi)

पति पत्नी की अनसुनी कहानी (Sad Emotional Story in Hindi) 

पत्नी बार बार मां पर इल्जाम लगाए जा रही थी और पति बार बार उसको अपनी हद में रहने को कह रहा था, लेकिन पत्नी चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह जोर जोर से चीख चीख कर कह रही थी कि उसने अंगूठी टेबल पर ही रखी थी और तुम्हारे और मेरे अलावा इस कमरे में कोई नहीं आया जाया करता। 

अंगूठी हो ना हो मां जी ने ही उठाई है और तुम्हारे और मेरे अलावा इस कमरे में कोई नहीं आया। अंगूठी हो ना हो मा जी ने ही उठाई है। 

बात जब पति की बर्दाश्त के बाहर हो गई तो उसने पत्नी के गाल पर एक जोरदार तमाचा मार दिया। अभी तीन महीने पहले ही तो शादी हुई थी। पत्नी से तमाचा सहन नहीं हुआ। वह घर छोड़कर जाने लगी और जाते जाते एक सवाल पूछा कि तुमको अपनी मां पर इतना विश्वास क्यों है? 

पति ने जो जवाब दिया, उस जवाब को सुनकर दरवाजे के पीछे खड़ी मां ने सुना तो उसका मन भर आया। 

पति ने पत्नी को बताया कि जब वह छोटा था तब उसके पिताजी गुजर गए। मां मोहल्ले के घरों में झाड़ू पोंछा लगाकर जो कमा पाती थी, उसी से एक वक्त का खाना आता था। मां एक थाली में मुझे परोस देती थी और खाली डिब्बे को ढककर रख देती थी और कहती थी कि मेरी सारी रोटियां इस डिब्बे में है। बेटा तू खा ले। 

मैं भी हमेशा आधी रोटी खाकर कह देता था कि मां मेरा पेट भर गया है, मुझे और नहीं खाना है। मां ने मुझे मेरी झूठी आधी रोटी खाकर मुझे पाला पोसा और बड़ा किया है। 

आज मैं दो रोटी कमाने लायक हो गया। लेकिन यह कैसे भूल सकता हूं कि मां ने उम्र के उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मारा है। क्या तुम्हें लगता है कि वह मां आज उम्र के इस पड़ाव पर किसी अंगूठी की भूखी होगी? यह मैं सोच भी नहीं सकता। 

तुम तो तीन महीने से मेरे साथ हो। मैंने तो मां की तपस्या को पिछले 25 वर्षों से देखा है। यह सुनकर मां की आंखों से आंसू छलक उठे। वह समझ नहीं पा रही थी कि बेटा उसकी आधी रोटी का कर्ज चुका रहा है या वह बेटे की आधी रोटी का कर्ज। 

दोस्तों, मां का कर्ज हममें से कोई भी कभी नहीं चुका सकता। पर दो शब्द याद आ रहे हैं, जिन्हें आप सब से कहना चाहता हूं,

जिसके होने से मैं खुद को मुकम्मल मानता हूं, जिसके होने से मैं खुद को मुकम्मल मानता हूं। मेरे रब से भी पहले मैं सिर्फ अपनी मां को जानता हूं। दुनिया की सभी मां को प्रवीन कोचर का शत शत प्रणाम।


7. बेबस मां की सीख देने वाली कहानी(Sad Emotional Short Story in Hindi with Moral)

बेबस मां की सीख देने वाली कहानी(Sad Emotional Short Story in Hindi with Moral)

सुबह का समय था। धूप की सुनहरी किरणें खिड़की से अंदर आ रही थी। पक्षियों का मधुर चहचहाहट सुनाई दे रहा था, लेकिन एक घर में एक मां की आंखों में आंसू थे। उसका 10 साल का बेटा रमेश बीमार था। 

डॉक्टर ने कहा था कि उसकी जान बचाने के लिए एक महंगी दवा की जरूरत है। मां रीमा गरीब थी। उसके पति की मृत्यु हो चुकी थी। वह एक छोटी सी दुकान में काम करके अपना और अपने बेटे का गुजारा करती थी। दवा खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। 

रीमा ने रिश्तेदारों से मदद मांगी लेकिन किसी ने भी उसकी मदद नहीं की। उसने बैंक से लोन लेने की कोशिश की, लेकिन बैंक ने उसे लोन देने से मना कर दिया। 

रीमा ने हार नहीं मानी। उसने दिनरात काम किया। उसने अपनी दुकान में सब्जियां भी बेचना शुरू कर दिया। उसने लोगों से दान भी मांगा। कुछ महीनों के बाद रीमा के पास दवा खरीदने के लिए पैसे जमा हो गए। 

उसने दवा खरीदी और रमेश को दी। रमेश धीरे धीरे ठीक होने लगा। रीमा बहुत खुश थी। रमेश पूरी तरह से ठीक हो गया। वह फिर से स्कूल जाने लगा। रीमा ने अपनी दुकान का विस्तार किया। रीमा और रमेश खुशी खुशी रहने लगे। 

कहानी का सीख (Moral of the Story)

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। हमें अपनी समस्याओं का सामना करना चाहिए और उनसे लड़ना चाहिए। हमें दूसरों की मदद के लिए भी हमेशा तैयार रहना चाहिए। 

यह कहानी एक बेबस मां की संघर्ष और उसकी जीत की कहानी है। यह कहानी हमें प्रेरणा देती है कि हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए।


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Rakesh Dewangan

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