ज़िन्दगी हर रोज़ कोई ना कोई – Zindagi, Safar, Thakan, Sham, Apna Ghar Shayari

ज़िन्दगी हर रोज़ कोई ना कोई
ताज़ा सफ़र मांगती है,
मगर थकान शाम को केवल
अपना ही घर मांगती है.

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